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पितृदोष- कारण व निवारण

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पितृदोष ज्योतिषशास्त्र में अत्यंत विघटनकारी व हर छेत्र में बाधाकारक माना गया है. अन्य दोषों की अपेक्षा यह दोष जीवनपर्यंत भाँती-भाँती के कष्ट देता रहता है. इसके प्रभाव से व्यक्ति को शारीरिक कष्ट, गंभीर बीमारियाँ, आकस्मिक दुर्घटना, नौकरी व व्यापार में बाधा, धन हानि, विवाह बाधा, वैवाहिक जीवन में क्लेश, संतान बाधा, संतान को कष्ट, शिक्षा में बाधा, परीक्षा में असफलता, पारिवारिक मन-मुटाव, मित्रों के बीच झगड़े, संपत्ति विवाद, कानूनी वाद-विवाद, ऊपरी बाधा आदि इस दोष के कारण संभव हो सकते हैं. इन सभी समस्याओं का कारण पितृ दोष हो सकता है. हमारे संपूर्ण शरीर की लम्बाई हमारे 84 अंगुल की होती अंगुल है. हर 1 अंगुल में 1 सह पिंड होता है. जन्म के समय 21 सह पिंड माता-पिता के होते हैं, 7 हमारे स्वयं के होते हैं व 56 हमारे पूर्वजों के सह पिंड होते हैं. इस प्रकार यदि किसी पूर्वज का कोई दोष होगा तो वह सह पिंड के रूप में हमारे अन्दर जन्म से ही हमारे अन्दर प्रस्तुत होकर शेष सह पिंडों को गंभीर रूप से प्रभावित करेगा. इसी को पितृ दोष कहते हैं. इसका व्याख्यान ज्योतिष शास्त्र में भलिभांति बताया गया है. इस दोष का निदान कई माध्यमों से संभव है जिसमें से 1 अतिलघु उपाय बताया जा रहा है. अन्य जानकारी के लिए हमारी संस्था से संपर्क कर सकते हैं. एकादशी से लेकर पितृ विसर्जन वाले दिन तक पितृ चालीसा व नीलकंठ स्तोत्र का पाठ दक्षिणमुखी होकर नियमित प्रातःकाल में करें. इसके बाद पितृ विसर्जन वाले दिन यथा संभव किसी सम्मानित व्यक्ति को भोजन आदि कराके उसका आशीर्वाद प्राप्त करें. ::पितृ चालीसा:: || दोहा || हे पितरेश्वर आपको दे दियो आशीर्वाद, चरणाशीश नवा दियो रखदो सिर पर हाथ। सबसे पहले गणपत पाछे घर का देव मनावा जी। हे पितरेश्वर दया राखियो, करियो मन की चाया जी।। || चौपाई || पितरेश्वर करो मार्ग उजागर, चरण रज की मुक्ति सागर। परम उपकार पित्तरेश्वर कीन्हा, मनुष्य योणि में जन्म दीन्हा। मातृ-पितृ देव मन जो भावे, सोई अमित जीवन फल पावे। जै-जै-जै पित्तर जी साईं, पितृ ऋण बिन मुक्ति नाहिं। चारों ओर प्रताप तुम्हारा, संकट में तेरा ही सहारा। नारायण आधार सृष्टि का, पित्तरजी अंश उसी दृष्टि का। प्रथम पूजन प्रभु आज्ञा सुनाते, भाग्य द्वार आप ही खुलवाते। झुंझनू में दरबार है साजे, सब देवों संग आप विराजे। प्रसन्न होय मनवांछित फल दीन्हा, कुपित होय बुद्धि हर लीन्हा। पित्तर महिमा सबसे न्यारी, जिसका गुणगावे नर नारी। तीन मण्ड में आप बिराजे, बसु रुद्र आदित्य में साजे। नाथ सकल संपदा तुम्हारी, मैं सेवक समेत सुत नारी। छप्पन भोग नहीं हैं भाते, शुद्ध जल से ही तृप्त हो जाते। तुम्हारे भजन परम हितकारी, छोटे बड़े सभी अधिकारी। भानु उदय संग आप पुजावै, पांच अँजुलि जल रिझावे। ध्वज पताका मण्ड पे है साजे, अखण्ड ज्योति में आप विराजे। सदियों पुरानी ज्योति तुम्हारी, धन्य हुई जन्म भूमि हमारी। शहीद हमारे यहाँ पुजाते, मातृ भक्ति संदेश सुनाते। जगत पित्तरो सिद्धान्त हमारा, धर्म जाति का नहीं है नारा। हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई सब पूजे पित्तर भाई। हिन्दू वंश वृक्ष है हमारा, जान से ज्यादा हमको प्यारा। गंगा ये मरुप्रदेश की, पितृ तर्पण अनिवार्य परिवेश की। बन्धु छोड़ ना इनके चरणाँ, इन्हीं की कृपा से मिले प्रभु शरणा। चौदस को जागरण करवाते, अमावस को हम धोक लगाते। जात जडूला सभी मनाते, नान्दीमुख श्राद्ध सभी करवाते। धन्य जन्म भूमि का वो फूल है, जिसे पितृ मण्डल की मिली धूल है। श्री पित्तर जी भक्त हितकारी, सुन लीजे प्रभु अरज हमारी। निशिदिन ध्यान धरे जो कोई, ता सम भक्त और नहीं कोई। तुम अनाथ के नाथ सहाई, दीनन के हो तुम सदा सहाई। चारिक वेद प्रभु के साखी, तुम भक्तन की लज्जा राखी। नाम तुम्हारो लेत जो कोई, ता सम धन्य और नहीं कोई। जो तुम्हारे नित पाँव पलोटत, नवों सिद्धि चरणा में लोटत। सिद्धि तुम्हारी सब मंगलकारी, जो तुम पे जावे बलिहारी। जो तुम्हारे चरणा चित्त लावे, ताकी मुक्ति अवसी हो जावे। सत्य भजन तुम्हारो जो गावे, सो निश्चय चारों फल पावे। तुमहिं देव कुलदेव हमारे, तुम्हीं गुरुदेव प्राण से प्यारे। सत्य आस मन में जो होई, मनवांछित फल पावें सोई। तुम्हरी महिमा बुद्धि बड़ाई, शेष सहस्र मुख सके न गाई। मैं अतिदीन मलीन दुखारी, करहुं कौन विधि विनय तुम्हारी। अब पित्तर जी दया दीन पर कीजै, अपनी भक्ति शक्ति कछु दीजै। || दोहा || पित्तरों को स्थान दो, तीरथ और स्वयं ग्राम। श्रद्धा सुमन चढ़ें वहां, पूरण हो सब काम। झुंझनू धाम विराजे हैं, पित्तर हमारे महान। दर्शन से जीवन सफल हो, पूजे सकल जहान।। जीवन सफल जो चाहिए, चले झुंझनू धाम। पित्तर चरण की धूल ले, हो जीवन सफल महान।। ::नीलकंठ स्तोत्र:: विनियोग – ॐ अस्य श्री भगवान नीलकंठ सदा-शिव-स्तोत्र मंत्रस्य श्री ब्रह्मा ऋषिः, अनुष्ठुप छन्दः, श्री नीलकंठ सदाशिवो देवता, ब्रह्म बीजं, पार्वती शक्तिः, मम समस्त पाप क्षयार्थंक्षे म-स्थै-आर्यु-आरोग्य-अभिवृद्धयर्थं मोक्षादि-चतुर्वर्ग-साधनार्थं च श्री नीलकंठ-सदाशिव-प्रसाद-सिद्धयर्थे जपे विनियोगः। ऋष्यादि-न्यास – श्री ब्रह्मा ऋषये नमः शिरसि। अनुष्टुप छन्दसे नमः मुखे। श्री नीलकंठ सदाशिव देवतायै नमः हृदि। ब्रह्म बीजाय नमः लिंगे। पार्वती शक्त्यै नमः नाभौ। मम समस्त पाप क्षयार्थं क्षेम-स्थै-आर्यु-आरोग्य-अभिवृद्धयर्थं मोक्षादि-चतुर्वर्ग-साधनार्थं च श्री नीलकंठ-सदाशिव-प्रसाद-सिद्धयर्थे जपे विनियोगाय नमः सर्वांगे। स्तोत्रम् ॐ नमो नीलकंठाय, श्वेत-शरीराय, सर्पा लंकार भूषिताय, भुजंग परिकराय, नागयज्ञो पवीताय, अनेक मृत्यु विनाशाय नमः। युग युगांत काल प्रलय-प्रचंडाय, प्र ज्वाल-मुखाय नमः। दंष्ट्राकराल घोर रूपाय हूं हूं फट् स्वाहा। ज्वालामुखाय, मंत्र करालाय, प्रचंडार्क सहस्त्रांशु चंडाय नमः। कर्पूर मोद परिमलांगाय नमः। ॐ इंद्र नील महानील वज्र वैलक्ष्य मणि माणिक्य मुकुट भूषणाय हन हन हन दहन दहनाय ह्रीं स्फुर स्फुर प्रस्फुर प्रस्फुर घोर घोर तनुरूप चट चट प्रचट प्रचट कह कह वम वम बंध बंध घातय घातय हूं फट् जरा मरण भय हूं हूं फट्‍ स्वाहा। आत्म मंत्र संरक्षणाय नम:। ॐ ह्रां ह्रीं ह्रीं स्फुर अघोर रूपाय रथ रथ तंत्र तंत्र चट् चट् कह कह मद मद दहन दाहनाय ह्रीं स्फुर स्फुर प्रस्फुर प्रस्फुर घोर घोर तनुरूप चट चट प्रचट प्रचट कह कह वम वम बंध बंध घातय घातय हूं फट् जरा मरण भय हूं हूं फट् स्वाहा। अनंताघोर ज्वर मरण भय क्षय कुष्ठ व्याधि विनाशाय, शाकिनी डाकिनी ब्रह्मराक्षस दैत्य दानव बंधनाय, अपस्मार भूत बैताल डाकिनी शाकिनी सर्व ग्रह विनाशाय, मंत्र कोटि प्रकटाय पर विद्योच्छेदनाय, हूं हूं फट् स्वाहा। आत्म मंत्र सरंक्षणाय नमः। ॐ ह्रां ह्रीं हौं नमो भूत डामरी ज्वालवश भूतानां द्वादश भू तानांत्रयो दश षोडश प्रेतानां पंच दश डाकिनी शाकिनीनां हन हन। दहन दारनाथ! एकाहिक द्वयाहिक त्र्याहिक चातुर्थिक पंचाहिक व्याघ्य पादांत वातादि वात सरिक कफ पित्तक काश श्वास श्लेष्मादिकं दह दह छिन्धि छिन्धि श्रीमहादेव निर्मित स्तंभन मोहन वश्याकर्षणोच्चाटन कीलना द्वेषण इति षट् कर्माणि वृत्य हूं हूं फट् स्वाहा। वात-ज्वर मरण-भय छिन्न छिन्न नेह नेह भूतज्वर प्रेतज्वर पिशाचज्वर रात्रिज्वर शीतज्वर तापज्वर बालज्वर कुमारज्वर अमितज्वर दहनज्वर ब्रह्मज्वर विष्णुज्वर रूद्रज्वर मारीज्वर प्रवेशज्वर कामादि विषमज्वर मारी ज्वर प्रचण्ड घराय प्रमथेश्वर! शीघ्रं हूं हूं फट् स्वाहा। ।।ॐ नमो नीलकंठाय, दक्षज्वर ध्वंसनाय श्री नीलकंठाय नमः।। कृपया POST को LIKE व SHARE करें. 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